मेरी तन्हाईयो से अकसर ये बात है होती
काश किसी पल में अपने साथ में होती
घिरी रहती हूँ ढेरो उलझनो में और सवालो में
काश! मैं जो ‘थी’ वही आज भी होती।

नहीं किसी से गिला और शिकवा साथ में होता
न किसीको मुझसे कोई शिकायते होती
“पलछिन” सा मन ये उडता रहता बादलों में
काश! मैं जो थी वही आज भी होती ।

न ढेरो सवालों का जवाब खोजती रहती
न रूठने मनाने की कोई बात यू होती
हवाओं जैसी खुलकर मे हसती ही रहती
काश! मैं जो……..

न वक्त यू चलता न फिजा रंग बदलती
उधेडबुन की दुनिया से दूर ही रहती
बचपन सी अठखेलियो में झूमती रहती
काश! मैं जो…….

क्या दायरे सीमित ही खुले आसमानो के
क्यों उडने वाली चिडिया बंद है पिजारों में
क्यो अब पंछियो की आवाज सुनाई नही देती
क्यों जैसी थी मैं पहले वैसी अब नही रहती ।।

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