वो लड़की

कुछ चुप सी कुछ अनकही सी
बातो को मन मे लेकर रहती है
कुछ उम्मीदें कुछ सपने बुनकर रखती है
मगर पागल हवा से डरती है
कही उड़ा न ले जाए ये सपने
इसलिये मन ही मन दबाकर रखती है
चेहरे पर रूप तो निखरा है
मगर आंधिया अंदर चलती है
हसी मे वो बचपना अभी भी है
मगर बड़े होने से डरती है
माता पिता की लाड़ली तो है मगर
फिर भी पराई सी लगती है
बोझ तो लेना चहती है पिता की चिं ताओ का
मगर सबको बच्ची लगती है
जिस घर मे बचपन बीता वो क्यो पराया होता है
रात दिन ये सवाल वो खुद से किया करती है..

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