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आज हर माता पिता अपने बच्चों को उच्च शिक्षा प्रणलि वाले स्कूलो मे भेज रहे है।बात सही है कि आज के प्रतियोगी दौर में भेजना भी चाहिये मगर सिर्फ प्रतियोगिताये ही जीवन का मकसद है क्या?

मोटी सेलेरी ,अन्धाधुन्ध भीड़ मे थकी मंदी जिंदगी जीना,समय की कनजुसियत और पैसो की अय्याशी यही ज़िन्दगी हम देना चाहते है क्या? शायद जवाब मे बहुत से लोग कहेंगे की आज की जरूरत है। क्या आज के अखबारो मे बढ़ती हुई नकारात्मक खबरें युवाओ और बच्चों के संस्कारो को नही दर्शाती।   

   पिछले 5-10 सालो मे बच्चों युवाओ मे जितने अपराध बड़े है ओर जो स्तर निचे गिरा है वो पहले कभी नही देखा और सुना।क्या हम अपनी भावी पीढ़ी को सिर्फ किताबी ज्ञान देकर संस्कारवान बना सकते है। नही किताबी ज्ञान से ज्ञान तो बढ़ता है मगर विवेक और समझदारी बिना कोई काम का नही रहता। आजकल माता पिता सब बाते छोड़ केवल पढ़ाई पर ही ध्यान देते है और विद्यालय भी । पहले पढ़ाई नही शिक्षा दी जाती थी जिसमे धर्म ,अर्थ शस्त्र और शास्त्र सभी मे निपुण होना पढ़ता था ।उसमे नैतिक शिक्षा प्रमुख होती थी पर आज यह गायब होती जा रही है..

इसके जिम्मेदार हम सब है। हम ही बचपन से बच्चों को सब्र करना,साझेदारी करना ,समता रखना नही सिखाते। उनकी हर ज़िद पूरी करना, मोबाइल,इंटरनेट ओर टी वी पर अपराधिक ओर उत्तेजक सामग्री देखना ओर देख़ने देना। आजकल तो कार्टून भी हिंसक दिखाए जाते है। एकल परिवार और हर बात की जल्दबाज़ी ओर गला काट प्रतियोगिताए बच्चो को अपराधिक प्रवत्ति बाद रही है।
आज स्कूल का समय ओर पढ़ाई इतनी बढ़ गई है की पारिवारिक माहोल से दूर हो जाते है यही एकल सोच की तरफ ले जाती है। बचपन से ही पारिवारिक और सामाजिक माहौल मे रहना नही सीखेंगे तो फिर हम केसे उम्मीद करे कि वे आगे जाकर अपनी जिम्मेदारी समझेंगे। बच्चों को समय दे और देने दे।।तभी वे मानवीय व्यवहार ओर समाजिक जिम्मेदारी समझेंगे और निभाएंगे।।
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