मैं बजार से लौटी तो बड़ी घबराइ हुई थी.. मैने सोचा ना था कि मेरा बेटा विवेक इस तरह किसी बुजुर्ग से बात करेगा.. रास्ते मे विवेक का दोस्त पंकज मिला था जो की उसके दादाजी को अस्पताल ले जा रहा था.. सुना मैने सब्जी खरीदते वक़्त विवेक को.. जो पंकज के दादाजी को कह रहा था.. पीछा क्यूँ नी छोडते आप अब पंकज और उसके मम्मी पापा का.. क्यों किसी व्रधाश्रम मे नही चले जाते ताकी ये अपनी सुकुन की ज़िन्दगी जी सके.. बस विवेक का इतना कहना हुआ और पंकज के दादाजी बाइक पर से धडाम से नीचे गिर गए दिल का दौरा पडा था उन्हे..

मुझे बहुत गुस्सा आया था विवेक पर..परंतु कुछ ना कह पायी उसे.. किस मुह से कह्ती.. ये मेरे और राम के ही दिए हुए गलत सन्सकार थे जो आज विवेक की जुबान से बयान हुए.. राम के पिता के रीटायरमेन्ट के दो साल बाद ही मै और राम उन्हे व्रधाश्रम छोड़ आये थे.. कारण कुछ नही था.. बस आठ दस दिन मे एक बार अस्पताल का चक्कर ओर दो तीन हजार की दवा..
कभी बाहर जाना हो तो उनके खाने का टन्टा, हमेशा मेरा राम को ये कहना की आखिर तुम्हारे बाउजी ने किया ही क्या है तुम्हारे लिए.. अब सब समझ आ रहा था मुझे की ये क्या किया हमने.. हम दोनों ने तो हमारे नाम सीता राम तक की लाज ना रखी..अयोध्या के दशरथ को ही हमने बहार कर दिया.. जिसने अपने खून पसीने से घर को सिन्चा उसे ही बेघर किया हमने.. मेरी इतनी बाते सुन राम भी फ़फ़क फ़फ़क कर रोने लगे.. ये कैसे सन्सकार हमने विवेक को दिए.. पंकज के दादाजी की ऐसी हालत का जिम्मेदार कौन हे.. उन्हे सिर्फ़ सुनने भर से ऐसा हुआ तो हमारे बाउजी उन पर तो बीती हे.. उनका क्या हाल हो रहा होगा.. फ़िर तुरंत मै राम के साथ गयी और बाउजी को उनके घर लाये हम..
दोस्तों ये तो महज एक घटना थी पर.. वस्त्विक्ता मे आज जो सन्सकार हम अपने बच्चों को दे रहे हे.. जो एकलता का पाठ इन्हे दे रहे हे क्या वो सही हे.. जो मान सम्मान से हम अपने बुजुर्गो को वंचित रख रहे हे.. क्या स्व्यम हम खुद को उसी भविष्य के लिए तैयार कर पाएन्गे.. शायद कभी नही.. तो कम से कम यही सोच कर हम बच्चों को सही संस्कार दे.|

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Neha Yadav

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