वो कहते हेना कि जहाँ दाँत हैं वहाँ चने नही और जहाँ चने हैं वहाँ दाँत नही | ऐसा ही कुछ मैंने देखा जब मैं पलासिया से गीता भवन कि ओर जा रहा था | मैंने देखा कि सामने से एक भीखारी आ रहा हैं जिसकी हालत बद से बत्तर थी | पास ही में सड़क के कौने में कुछ रोटिया पड़ी थी | उन रोटियो पर मेरी नज़र नही गयी क्योंकि शायद मेरी नज़र उन रोटियो पर पड़ भी जाती तो मैं उन पर ध्यान नही देता और शायद भीखारी की नज़र इसलिए गयी क्यूंकि उसे उन रोटियों कि ज़रूरत थी |

कर रहा वो अन्न का अपमान है जिसको ना उसकी पहचान है और ना हो रहा नस़ीब उसको, जिसकी अन्न में अटकी जान हैं|

गाँव में तो बचा हुआ खाना गाए को डाल दिया जाता हैं पर शहरो में तो कई जगह ऐसी हैं जहाँ पर गाए के दर्शन तक नही होते हैं | और जो बचा हुआ खाना हैं उसे हम या तो किसी खाली मैंदान में फैक देते हैं या डस्टबीन में ड़ाल देते हैं | पर हम यह नही सोचते कि हम उतना ही बनाए जितने की हमें जरूरत हैं | अगर हम उतना ही बनाऐंगे जितने कि हमें ज़रूरत हैं तो अन्न का अपमान ही ना होगा इन सब बातों का उस गरीब की या उसके जैंसे और भी गरीबों की भूख से कोई रिश्ता नही हैं पर इससे अन्न का अपमान तो नही होगा |

चाहे करलो कितनी भी पूजा विधान.. या करोड़ो रूपयों का दान, सम्रद्धि ना मिलेगी तुमको, अगर ना कर सकते तुम अन्न का सम्मान|

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Nishchay Khire

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2 Thoughts to “अन्न- सम्मान और अपमान..”

  1. Pray in gupta

    Nice

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