यह एक गलत भ्रांति है कि व्यक्ति को सफलता उसके पहनावे या खूबसूरती से मिलती है जबकि सच तो यह है कि आपकी कामयाबी आपके भीतर ही छिपी है ,बस जरूरत है तो उसे तराशने की।

कोई सफल इसलिए बन जाता है क्योंकि वह अपने धोखे या दर्द को लेकर जीवन भर विलाप नहीं करता जबकि अपने सामर्थ्य के बल पर अपना जीवन निर्मित करता है ।

दानवीर कर्ण अगर अपने भाग्य को कोसते और अपनी वर्तमान स्थिति को उनकी असफलताओं का हिस्सा मानते तो आज इतिहास के सुनहरे पन्नों में उनकी वीरता के किस्से ना होते..

महंगे वस्त्र, घड़ी, जूते इत्यादि आपके व्यक्तित्व को निखारती तो है मगर सिर्फ बाहरी तौर पर, लेकिन परमानंद तो आंतरिक संतोष में है आत्मा को जानने में ही संतुष्टि है क्योंकि आप कभी अधूरी नहीं हो अधूरा है तो यह मोह से भरा मन जो हर वक्त तुम्हें अपने लक्ष्य से भटकता है ।

भारत के 11 राष्ट्रपति डॉक्टर ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन बिल्कुल सादा था। उनकी सोच परिपक्व थी और रिसर्च, विकास के लिए हमेशा अग्रसर रहते थे। शायद इसलिए उन्हें मिसाइल मैन के नाम की संज्ञा से नवाजा गया, भारत के प्रसिद्ध अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी अगर अपनी शक्ल और कालेपन को अपनी नाकामयाबी का पहलू मानते तो वह आज एक उम्दा कलाकार नहीं जाने जाते।

अगर आप स्वयं को इस तरीके से मजबूत बनाओ तो आपको भी सफलता के कदम चूमने से कोई नहीं रोक सकता अगर समाज की दकियानूसी सोच पर भरोसा किया जाए तो सपनों का सत्य होना असंभव सा प्रतीत होगा इसलिए अगर महापुरुषों की तरह महान बनना है, तो सर्वप्रथम अपने जुनून और जज्बे का सम्मान करना होगा ।
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Kapil Jain

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2 Thoughts to “आँतरिक संतोष: सफलता का आधार..”

  1. Pratik

    Nice

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