—-रोबिन हुड आर्मी—-

मैंने सूरज को शाम में ढलते देखा था.
.मैंने लोगों को भूख से ठिठुरते, कइयों को इस दुनिया से रुखसत होते देखा था.
मैंने बच्चों को तड़पते और बड़ों को लाचार होते देखा था.
मैंने बूढ़ों को भुक से बीमार होते देखा था.
पर आज

मैंने चांद को नील (गगन)में उठते हुए देखा है.

कुछ लोगों को उम्मीद में जीते हुए देखा है.
लोगों को मिलकर कुछ करते हुए देखा है.
फिर एक बार गरीबों को पेट भर सोते हुए देखा है. मैंने आज किसी को रोबिन हुड बनते हुए देखा है.
जाने अनजाने ही सही मैंने तुझ में और मुझ में रोबिन हुड देखा है.

आज लाखों की भीड़ में हजारों को मैंने आगे आते हुए देखा है.
सालों से चले आए रीत-रञा के फासले को मिटाऍ एक साथ होते देखा है.
राम और रहीम को मैंने एक साथ एक ही थाली में खाते हुए देखा है.

आज फिर किसी को मैंने रोबिन हुड बनते देखा है. जाने अनजाने ही सही मुझ में और तुझ में मैंने रोबिन हुड देखा है.

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Snehal Mehta

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