गर्व से कह सकती हूँ मैं भी
मैं एक शाकाहारी हूँ।

नहीं काट खाती उन जिव को,
नहीं मारती बेबस प्राणी को।

‘मैं इंसान हूँ, तू जानवर,
तुझको मरना ही पडे़गा।

मेरी भूख मिटाने के लिए,
तुझको कटना ही पडे़गा।’

यही आज कि दुनिया है।
भूल गए हैं यह लोग,

कि जान उस में भी उतनी है,
जितनी एक इंसान में।

धड़कन उस में भी चलती है,
जैसे एक इंसान में।

देखा है मैने कि कैसे
वह छट-पटाते हैं।

जब उनके जिस्म पर आरी चलती है, 
कैसे वह रोते गाते हैं।

‘कोई बचालो मुझको भी,
मुझ में भी तो जान है।

नहीं चलाओ मुझ पर आरी,
मुझ में भी तो मांस है।’

वह बेरहमी से काट देते हैं,
उसका खून बहा देते हैं।

दर्द नहीं होता है उनको,
उसे तो वह स्वाद से खा लेते हैं।

बिरयानी खाने से पहले,
उसकी चीख सुन लेते तुम।

जब आरी से काटा था उसको,

दर्द उसका समझ लेते तुम।

तुम्हारा शरीर कोई शमशान है,

या बताओ मुर्दाघर,

कैसे भूख मिटा लेते हो?

उस बेबस प्राणी को मार कर।।

इंसान कि इंसानियत नजाने कहां खो गई है,

दर्द महसूस करने वाले, 

आज तुम्हारी ममता नाजाने कहां खो गई है।

शाकाहारी बनो।। ♥ ♥ ♥

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Komal Agrawal

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6 Thoughts to “शाकाहारी बनो…!”

  1. Divyanshu

    Beautiful…… being a vegetarian I can understand your feelings…..keep going😊😊😊😊

    1. Komal

      Thank u so much…It really means alot to me❤

  2. Sunayana Jain

    Well define poem written by Komal ..I like it very much .

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