रेत सी है यह ज़िन्दगी भी…

दिन बीतते चले जाते है,
हम महीनो पर पहुँच रहे होते है की साल बदल जाता है।

बार बार मुट्ठी बंद करते है कि कुछ रह जाए हमारे पास
पर सब रेत सा धीरे धीरे रिसता चला जाता है।

कुछ तो रह जाए, हम हाथ खोलते है
और हाथो में कुछ रेत के दाने,दबे छिपें दिख जाते है।

पुरा जीने के बाद थोड़ा सा..
बहुत थोड़े में भी एकदम बारीक।।

और वो छोटे छोटे दाने ही हमारे जीने की वजह बन जाते है…।

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Tarun Jain

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