कई दिनों से अनछूए मेरे दिल के किसी कोने में यादों का जाला सा लगा है। उसे हटाने के कई प्रयास किए मैंने, लेकिन कुछ ज़िद्दी सा मालूम पड़ता हैं|साफ़ हो ही नहीं रहा है।

पहली दफे उसकी बर्थडे पार्टी में हम मिले। साँवला सा दमकता हुआ चेहरा, लाल रंग का वन पीस और कुछ इंच की हील पहन कर ख़ुद को एक नयी ऊँचाई दे रखी थी उसने। वो उस दिन उतनी ही ख़ूबसूरत लग रही थी जितना कि मैं अपने ख़्वाब में एक मोहब्बत देखता हु। उस बर्थडे पार्टी की हवा में बही उसकी ख़ुशबू मुझे बहका देती है |

उसी दिन मेरा दिल तो फिसल गया था। लेकिन वो कहते है ना ‘अट्रैक्शन’ शायद ये वो ही बला न हो इसीलिए हमने वक़्त दिया | फिर सिलसिला बातों का कुछ यूँ शुरू हुआ मानो मेरा सारा वक़्त ही उसका हो गया, लफ़्ज़ चाहे कुछ हो, या कुछ से ज़्यादा,पर इनका कारवाँ अब उसका हो गया |पहले दिन गुज़रता था,रातें भी कटती थी, पर अब सुबह,शाम हर एक एक पल उसी का हो गया था। हाँ..शायद दिल के किसी कोने में प्यार सा कुछ पलने लग गया था लेकिन ज़रा भी उसकी ख़बर नहीं थी मुझे |जो लड़का कभी किसी लड़की से बात करने से हकलाता था,अब सारी सारी रात केसे फ़ोन पर बात करने लग गया था |

उसके इर्द-गिर्द मैं अपनी एक नयी दुनिया सोचने लग गया था । इसे शब्दों में बयाँ कर पाना बेहद मुश्किल है।

सिलसिला ज़ोरों-शोरों से जारी ही था, कुछ वक़्त बीता,अब में उससे कुछ उम्मीदे पालने लग गया था ,उम्मीद थी कि मुझे चुना जाएगा,बदले में उतना ही प्यार वापस मिलेगा|
उम्मीद थी की मुझे सबसे आगे रखा जाएगा शायद मैं इतना मतलबी हो गया था कि मैं ये भी भुल गया था कि उम्मीद सिर्फ़ मेरी है, ज़रूरी नहीं कि सामने वाला हमारे मुताबिक़ चले, उसका अपना भी एक जीवन है।
धीरे धीरे शायद उसका दम घूँटने लग गया था लेकिन वो कह नहीं पायी और इधर मैं उसके इश्क़ में जोगी होता जा रहा था| मैं अपने सारे सपने भी अब उसके साथ देखने लग गया था।

जज़्बातों को वो कभी कह नहीं पायी और ना कभी ज़िक्र कर पायी, फिर एक दिन हिम्मत जुटा के उसने मुझे सब कुछ बता दिया जो कई दिनो से उसके ज़हन काँटे की तरह चुभ रहा था.
मैं सन्न सा रह गया मानो एक पल में ज़िंदगी ने पासा बदल दिया हो |

वो महज़ कुछ ही दिनो का साथ था हमारा, फिर हम अलग हो गये, अचानक ज़िंदगी थम सी गयी थी,यूँ अचानक अलग हो गये थे हम..संभलना बेहद मुश्किल था |मैं कई दिनो तक अनंत में खो गया !

फिर कुछ दिनो बाद मुझे महसूस हुआ कि, अलग हो जाना ही बेहतर था हमारा रिश्ता ख़ूबसूरत था और वो हमेशा रहेगा क्यूँकि अब हम अलग हो चुके है,हमारा रिश्ता उन सड़े गले रिश्तों सा नहीं है जिसमें साथी से ऊब तो गए है लेकिन अलग नहीं हो सकते है।
साथ होते तो क्या होता, धीरे-धीरे हर छोटी-छोटी बात पर झगड़ा होता,वक़्त के साथ एक दूसरे की अहमियत भुल जाते,एक दूसरे की मौजूदगी का सम्मान भुल जाते।
ऐसा रिश्ता नहीं चाहता था मैं और शायद वो भी।

अब हम अलग हो चुके थे, उसे एक बार जी भर के देखने की तमन्ना थी मेरी, मुझे होश ही नहीं रहा उसके सामने आ जाने के बाद ….❣

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Tarun Jain

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One Thought to “यादों का जाला..”

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