जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा
जहाँ सत्य, अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा
ये धरती वो जहाँ ऋषि मुनि जपते प्रभु नाम की माला जहाँ हर बालक एक मोहन है और राधा हर एक बाला जहाँ सूरज सबसे पहले आ कर डाले अपना फेरा
वो भारत देश है मेरा
अलबेलों की इस धरती के त्योहार भी हैं अलबेले कहीं दीवाली की जगमग है कहीं हैं होली के मेले जहाँ राग रंग और हँसी खुशी का चारों ओर है घेरा
वो भारत देश है मेरा
जब आसमान से बातें करते मंदिर और शिवाले जहाँ किसी नगर में किसी द्वार पर कोई न ताला डाले प्रेम की बंसी जहाँ बजाता है ये शाम सवेरा
वो भारत देश है मेरा

— राजेंद्र किशन

भारतवासीयोंको भारत के 70वे गणतंत्र दिन की शुभकामनाएं |

आज के दिन सब से पहले भगवान को कृतज्ञतापूर्वक नमस्कार करता हुं क्यों कि उन्होंने हमें आजादी दिलाई।* आप कहेंगे ऐसा क्यों? भगवान ने कौनसी भूमिका निभाई स्वतंत्रता-संग्राम में? किसीको ऐसा भी लगेगा की आप भारतीय लोग हर बात में भगवान को क्यों बीच में ले आते हो? इसलिए इस बात की स्पष्टता पहले कर लें। हां, हम भगवान को हर बात में ले आते हैं क्यों कि उनके बगैर मेरा या आपका या हमारा अस्तित्व ही नहीं! हमारा क्या, इस सृष्टि का अस्तित्व नहीं! और मैं बौद्धिक तौर पर भी इस बात को कह सकता हुं की भगवान ने हमें स्वतंत्रता दिलाई। यद्यपि यह मेरी जो सोच है, वह पांडुरंग शास्त्रीजी आठवले ने बनाई। द्वितीय महायुद्ध में ब्रिटन और उसके साथी देश विजयी हुए। विन्स्टन चर्चिल, जो उस समय ब्रिटन के प्रधान मंत्री थे, उन्होंने अपने जवानों तथा नागरिकों का मनोबल खुब टिकाया एवं बढ़ाया भी। युद्ध के बाद ब्रिटन में तुरंत चुनाव हुए। स्वाभाविक है जिस व्यक्ति ने आपको जीताया है, वही चुनाव में जीत कर आना चाहिए। अपितु हुआ ऐसा की चर्चिल चुनाव हार गए। एटली की लेबर पार्टी सत्ता में आई। वह भारत तथा अन्य देश, जिन पर ब्रिटीश साम्राज्य था, उन्हें स्वतंत्रता देने के पक्षधर थे। जबकि चर्चिल का दृष्टिकोण भारत के बारे में सर्वविदित है। अब ऐसा क्यों हुआ? लोगों का दिमाग किसने घुमाया? तब मैं मानता हुं की भगवान ने घुमाया। कारण समय अब आ गया था जब भारत स्वतंत्र हो तथा दुनिया का मार्गदर्शन करे। (अब कितना किया? यह एक दुसरा प्रश्न है।) इसलिए प्रथम भगवान को कृतज्ञतापूर्वक नमस्कार।

*दुसरा नमस्कार उन सभी लोगों को जिन्होंने इस देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सबकुछ, यहां तक की अपना जीवन भी, दांव पर लगा दिया।* जिन लोगों ने यह नहीं सोचा की उनका खुदका और उनके परिवार का क्या होगा! वाचक मित्रों, आप जरा सोचिए। लड़ाई किसके साथ थी? एक ऐसे साम्राज्य के साथ जिसके क्षितीज पर सूर्य कभी अस्त नहीं होता था। सफलता मिलेगी या नहीं, कोई हमारे बलिदान को याद करेगा या नहीं, कोई प्रकार की अपेक्षा नहीं। बस, स्वतंत्रता के इस महायज्ञ में झोंक दिया अपने आप को। उपर कविता में कही बातों के लिए ही सिर्फ सोचा और उसी के लिए लडे। *एक १६/१७ साल का लड़का, खुदिराम बोस, हंसते हंसते सूली पर चढ गया।* *एक ६५/७० साल के महामानव, लाला लाजपत राय ने हंसते हंसते अंग्रेजों की लाठी झेली और अपनी जान न्यौछावर कर दी।* *एक ३०/३५ साल का युवा, स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर, परिवार की परवाह किए बगैर आंदामानमें ५० साल की एक नहीं अपितु दो-दो सजा मुस्कराकर स्वीकार लेता है।* *आज भी भगतसिंह, राजगुरु तथा सुखदेव के बलिदान को याद कर सर ऊंचा उठता है।* *तात्या टोपे, मंगल पांडे, वसुदेव बलवंत फड़के, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, असफाकउल्लाह खान, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, बिपीनचंद्र पाल यह सारे नाम सुनकर सीना अभिमान से फुल जाता है।* इस सारी लड़ाई में हमारी माताएं-बहनें कहीं पीछे नहीं थी। *रानी लक्ष्मीबाई, कित्तुर रानी चेन्नम्मा, कल्पना दत्त, अरूणा आसफ अली और उन जैसी कई महिलाओं ने भी सक्रिय भूमिका निभाई।* कितने नाम याद करें और कितने लिखें, इसलिए यहीं रूक कर सभी को कृतज्ञतापूर्वक नमस्कार करता हूं।

*तीसरा नमस्कार उस व्यक्तिमत्त्व को जिसने सारे भारत को एक करने हेतु सारे भारत का भ्रमण कीया। उन्हें लोग आधुनिक भारत का चाणक्य कहते हैं। ५०० से ज्यादा रजवाड़ों को समझाकर, प्यार से भारत में सम्मिलित कर लिया। जो समझाने पर नहीं माने, उनको उनकी ही भाषा में समझाकर सम्मिलित किया। यह व्यक्ति ओर कोई नहीं अपितु महात्मा गांधी की बातों पर अडिग तथा अविचल श्रद्धा रखनेवाले सरदार वल्लभभाई पटेल।* उस समय की कांग्रेस का संगठन अगर मजबूती से खड़ा था, गांधीजी की कही हर बात को उठाने तैयार था, तो उसमें इस एक व्यक्ति का बड़ा कर्त्तृत्व रहा है। इस महामानव को हम भारत रत्न से नवाजे या नहीं, वह भारत मां के सच्चा रत्न है। आज की पीढ़ी उस व्यक्ति के बलिदान को समझ भी पाएगी या नहीं यह सवाल मन को सताता है। क्या उनके परिवार को आज कोई पहचानता है, यह यक्ष प्रश्न है। उनके परिवार के साथ किया गया बर्ताव किसी भी सभ्य समाज को सोचने पर मजबूर करेगा कि क्या इसलिए आजादी के लिए वह सब लड़े होंगे? उनको अपेक्षा भले ही न रही हो, पर हम देशवासियों का उनके प्रति कुछ कर्तव्य है या नहीं?

आज का दिन जैसे खुशी मनाने का है, वैसे सोचने का भी है। भारत आज 70 साल बाद कहां खड़ा है? *भारत विश्वगुरु तो ठीक अपने गली (आशिया खंड) का भी गुरु कहलाने लायक है?* *तकनीकी विकास एवं आर्थिक सुदृढ़ीकरण से ही क्या हम यह कर पायेंगे?* एक समय था जब विश्व भारत से आध्यात्मिक चेतना पाता था। *स्वामी विवेकानंद तथा गुरू अरविंदो उसकी चेतना थे।* *विनोबाजी तथा रविशंकर महाराज (गुजरात) जैसै समाज की भावनाओं को टिकाने और बढ़ाने वाले निस्वार्थ समाजसेवी थे।* भारत की चेतना हमेशा से भावनिक एवं आध्यात्मिक रही है। आज हम कहां हैं? इसका मतलब कोई यह न समझे की मैं तकनीकी विकास के खिलाफ हुं। पर सिर्फ उसी एक अंग की तरफ ध्यान देकर भी नहीं चलेगा। भारत का तथा भारतीयोंका विकास सर्वांगीण होना होगा। तभी वह फिर से सोने की चिड़िया कहलायेगा। और इस दिशा में पूरे समाज ने काम करना होगा। व्यक्ति की सोच में परिवर्तन लाना होगा। शिक्षा में से भारत के लिए प्यार और संवेदना जगानी होगी। तभी जाकर उसका परिणाम थोड़े सालों बाद दिखेगा।

हमारे जीवन में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रिय अस्मिता यह दोनों को जगाने की अत्यावश्यकता है। सही इतिहास पढ़ाना होगा। वामपंथी तथा दक्षिणपंथी विचारधाराओं से ऊपर उठकर सोचना होगा, लिखना होगा तथा जीना होगा।

*त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।*
*ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥*

(कुल के हितार्थ एक का त्याग करना, गाँव के हितार्थ कुल का, देश के हितार्थ गाँव का और आत्म कल्याण के लिए पृथ्वी का त्याग करना चाहिए ।)

हमने सभी ने अपने कुल, गांव, राज्य से ऊपर उठकर सोचना होगा। अपने मान-सम्मान, जय-पराजय, बड़ा-छोटा इन बातों में से निकलकर हर एक व्यक्ति की बात सुननी होगी। किसके मुंह से कौनसी अच्छी बात कब भगवान बुलवा दे, क्या मालूम!
मां भारती के हित को सर्वोपरि मान सब ने साथ मिलकर निर्णय लेने होंगे।हमारी संविधान सभा ने, हम सब अपने मतभेदों के बावजूद, साथ काम कर सकते हैं, इसका उत्तम उदाहरण हमारे सामने रखा है। *हर एक व्यक्ति को जब लगेगा की यह देश मेरा है और इसको सही ढंग से चलाना, संभालना, आगे ले जाना यह मेरी जिम्मेदारी है तभी भारत जनतंत्र होगा।* जब हरेक व्यक्ति अपनी राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी समझेगा तभी हमें सच्चे अर्थ में स्वतंत्रता प्राप्त होगी।

इसे करने के लिए हमने भारत भ्रमण करना होगा। भारत के कोने-कोने में जाना होगा। लोगों से यत्किंचीत स्वार्थ के बगैर जुड़ना होगा। लोगों में सोयी भावनिकता तथा आध्यात्मिकता को प्यार से जगाना होगा। तभी राष्ट्रीय चेतना का उदय होगा। तभी भारत महान बनेगा।

हम यह सब न कर सकें तो कम से कम जो यह काम कर रहे हैं, उनके प्रयत्नों में उपयोगी बनें। वह भी न कर पायें तो कम से कम उन प्रयत्नों की सराहना करें। और कुछ नहीं तो उनके काम में रोड़े तो न डालें।

मेरे वाचकों से भी नम्र विनंती है की कुछ छोटी छोटी बातें हम भी अपने जीवन में लाने की कोशिश करें तो वह भी बड़ी देशसेवा होगी। जैसे

१ *गाड़ी चलाते वक्त सिग्नल न तोड़ना तथा अपने मोबाइल पर बात न करना।*
२ *अपने आपको निरोगी रखना। स्वस्थ नागरिक राष्ट्र की संपत्ति है।*
३ *हर साल अपने घर में अथवा आसपास के परिसर में एक पौधा लगाना और उसकी अच्छी तरह से देखभाल करना।*
४ *अपने घर के आसपास का परिसर साफ व स्वच्छ रखना।*
५ *प्लास्टिक का उपयोग टालना।*

ऐसी ओर कई बातें हो सकती है, जो वाचक खुद तय कर सकते हैं और अपने जीवन में लाने की कोशिश कर सकते हैं। आज इस 70वे गणतंत्र दिवस पर हम सब मिलकर इतना भी कर सकें तो राष्ट्रदेवता जरूर खुश होंगी और हमें अपना बहुमूल्य आशिर्वाद प्रदान करेंगी।
*भारत माता की जय ।*
*वंदे मातरम् ।*

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Ameet Kothari

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6 Thoughts to “गणतंत्र दिन।”

  1. Khushi

    Jai Hind !!

  2. Pramod dave

    Very good

  3. Bharat Joshi

    Sencible Salutation Amit. Y-Day celebration in Befiting manner. Keep it up. JY

  4. pratik chandak

    jai hind

  5. Manik Hon

    Jai Hind!!!

  6. Fenal Shah

    Nicely crafted ..

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