मैं फोन रखती हूं ,हम बस में बैठ चुके हैं जयपुर के लिए , अपना ख्याल रखना बेटा |
इतना कहकर मां ने फोन रख दिया
रक्षाबंधन के बाद मां से और बहन से मिलने का मौका मिल रहा था , बस उनसे मिलने की खुशी और बेचैनी में दिल गदगद सा था | आखिर पहली बार मां और बहन मुझसे मिलने जयपुर आ रहे थे | मैं तो मानो बेचैनी से उम्मीद के दरिया में गोते सा खा रहा था |
अगली सुबह मुझे फोन आया ! फोन पर बहन थी उसने कहा भैया हम जयपुर आ गए,
काफी वक्त बाद उनसे रूबरू हुआ था, उनकी आंखों में भी मैं मुझसे मिलने की खुशी महसूस कर पा रहा था | उनसे मिलकर कुछ घंटों के लिए तो ऐसा लगा कि मानो मैं अपने सारे दर्द और परेशानियों को भूल चुका हूं |
मन तो कर रहा था कि वक्त पर लगाम लगा दूं | फिर इस पागल मन को समझाया कि इस पर तो किसी का बस नहीं |

हमने जल्दी चाय की टपरी पर गरम गरम चाय पी और घूमने की योजना बनाई, फिर क्या था मैंने गूगल मैप पर सबसे पास का टूरिस्ट डेस्टिनेशन देखा तो पता चला कि हवा महल ही सबसे पास है|
मैंने कैब बुलाई और हम तीनों निकल पड़े प्यार से भरे लम्हों के सफर पर |
हमने शॉपिंग कि , खूबसूरत नजारों को देख , काफी गुफ्तगू के बाद शाम होने को आई | मैं इस रंगीन सफर को कभी नहीं भूलने वाला था , क्योंकि इस सफर में सफर कम अपनों का प्यार सुझाव और ख्याल ज्यादा था |

बस अब रात हो चुकी थी और उन्हें अलविदा कहने का वक्त आ गया था | लेकिन मुझे अब भी याद है कि जो प्यार हम लफ्जो में बयां नहीं कर पाए वह उनकी आंखों में था |

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Kapil Jain

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