वो है तो ज़िन्दगी में खुशियां ही खुशियां है,
वो है तो हर जगह उम्मीदों की नई बगिया है।
कभी कभी सोचता है ये मन,
क्या रहा होगा उसका बचपन?
उसकी खववहिशे?
उसका मन ?

वो भी कभी मासूम हुआ करती होगी ,
काम को देख कर वो भी जी चुराया करती होगी।
लेकिन, लेकिन आज वो हर काम को कर जाती हैं,
थकान की एक शिकन ना चेहरे पर लाती है।
बस अपने बच्चो को हर खुशी देना चाहती है,
एक मकसद रह गया है उसकी ज़िन्दगी का,
नाम बनता देखे वो अपने बच्चो का।
इसी उम्मीद के साथ वो हर सुबह फिर से ,
एक नई उधेड बुन में लग जाती है ।

आज वो सूरज की उस पहली किरण की तरह नजर आती है ,जो सारा अंधेरा दूर कर उजियारा दे जाती है।
गुस्सा तो वो भी करती है, लेकिन,
उस गुस्से में जो प्यार है उसे दिखाने भर से डरती हैं।
कहीं रास्ता ना भटक जाए हम ,
इसीलिए डांट डांट कर सही राह पर लाती है।
वो मां ही है जो अपने बच्चो को अपने से ज्यादा चाहती है।

Komal Bihani

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6 Thoughts to “वो मां ही है..”

  1. Aashray darji

    Superb

  2. Komalji Many of my friends have liked your poem and really appreciate your work… Keep writing… They still are learning to write comments… Not so net friendly people…

    1. Komal

      Thank you for such an appreciation.
      Keep supporting.

  3. Alisha Parmar

    Very nice poem👌

  4. Ajit Datir

    Komalji, really nice article. Short, sweet and precisely written!!

  5. Mohan Kale

    Nice

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