बचपन और बुढ़ापा
उन तकिए और कम्बल में से बुढ़ापे की महक आ रही थी।और वह बूढ़ी दादी मानो हर रोज अपने बुढ़ापे को कोसा करती थी और भगवान से पूछा करती थी कि

‘यह बुढ़ापा उन पर कहर कि तरह क्यों बरसा है?’

उनकी पोती उनके पास आई,उनका सर दबाया,अपने कोमल हाथों से उनकी पीठ सहलाई और पूछी,”दादी, आप हर रोज अपने बुढ़ापे से परेशान क्यों रहती हैं?
मेरी टीचर तो हमें कहतीं हैं कि,
यह बुढ़ापा हमें वरदान में मिलता है। जिस बचपन को हम जवानी में खो देते हैं, वह इस बुढ़ापे में हमारे पास लौट आता है।”
यह बात सुन, दादी मुस्कराई और पोती की ओर देखकर बोली :-बात तो तेरी सही है कि बुढ़ापे में
बचपन लौट आता है,बस कुछ फर्क रह जाता है।बचपन में भी हमारे दांत टूटते हैं और बुढ़ापे में भी, बस फर्क यह रह जाता है कि बचपन में दांत टूट कर मजबूत दांत आते हैं और बुढ़ापे में वह भी कमजोर हो जाते हैं।बचपन में भी हम अच्छे से चल नहीं पाते हैं और बुढ़ापे में भी।
बस फर्क यह रह जाता है कि बचपन में हम चलना सिखा करते हैं, गिरते-पड़ते उठना सिखा करते हैं, और बुढ़ापे में वही पैर लड़खरा जाया करते हैं।
बचपन में हम बेवजह हँसते और रोते हैं लेकिन बुढ़ापे में ना तो बेवजह हम रोते हैं और ना ही हँसते हैं।

क्योंकि जिस जवानी का बचपन में हमें बेसब्री से इंतजार रहता है, उस ही जवानी से हम बहुत कुछ सीख चुके रहते हैं।

बचपन में हमारी पूरी जिंदगी हमारा पलकें बिछाए इंतजार करती हैं,और बुढ़ापे में हम बस भगवान को प्यारे होने का इंतजार करते रहते हैं।
बस यही फर्क है कि बचपन में हम बहुत नासमझ हुआ करते हैं और बुढ़ापे में हम जिंदगी से बहुत कुछ सिख चुके रहते हैं।

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Komal Agrawal

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One Thought to “बचपन और बुढ़ापा”

  1. Sunayana Jain

    Jivan ki paribhasha k sahi arth… Well done

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