सफर- ए – ज़िन्दगी

सफर- ए - ज़िन्दगी

क्यों गुमान है तुझे अपने होने पर,
क्यों नाज़ है तुझे अपनी शौहरत पर,
सांसे बाज़ार में ना बिका करती है।
ज़िन्दगी हर पल धोखा देती हैं,
अहमियत तो कर्मो से दिखाई पड़ती है।

तू हर पल को जीने की ख्वाहिश रख,
मानो खुशियों का मेला है जिंदगी,
तू छोटी छोटी खुशियों को समेटता चल।
तू गिर, तू रुक, तू चल, तू दौड़,
लेकिन दर्द को हराता चल।

बहुत छोटा सफर है ज़िन्दगी का,
तू अपने रिश्तों को संजोता चल,
तू अपने जज्बात बांटता चल।
ज़रा सी बेवफ़ा है ज़िन्दगी,
जाने कब मौत का आंचल थमा दे,
तू हर पल ख़ुशी के गीत गाता चल।

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