बचपन और बुढ़ापा

उन तकिए और कम्बल में से बुढ़ापे की महक आ रही थी।और वह बूढ़ी दादी मानो हर रोज अपने बुढ़ापे को कोसा करती थी और भगवान से पूछा करती थी कि ‘यह बुढ़ापा उन पर कहर कि तरह क्यों बरसा है?’ उनकी पोती उनके पास आई,उनका सर दबाया,अपने कोमल हाथों से उनकी पीठ सहलाई और…

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लेकिन इंसान है सब,  

वो गिता और कुरान कि तुम बातें किया करते हो,खुदा और भगवान में तुम फर्क किया करते हो। हिंदू और मुस्लिम होने पर तुम गर्व किया करते हो, लेकिन इंसान है सब, यह भूल कर तुम आपस में ही लड़ा करते हो। क्या नहीं दिखता तुम्हें कि खून का रंग सबका एक है, क्या नहीं…

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शाकाहारी बनो…!

गर्व से कह सकती हूँ मैं भीमैं एक शाकाहारी हूँ। नहीं काट खाती उन जिव को,नहीं मारती बेबस प्राणी को। ‘मैं इंसान हूँ, तू जानवर,तुझको मरना ही पडे़गा। मेरी भूख मिटाने के लिए,तुझको कटना ही पडे़गा।’ यही आज कि दुनिया है।भूल गए हैं यह लोग, कि जान उस में भी उतनी है,जितनी एक इंसान में।…

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