समाज मे संस्कार..

मैं बजार से लौटी तो बड़ी घबराइ हुई थी.. मैने सोचा ना था कि मेरा बेटा विवेक इस तरह किसी बुजुर्ग से बात करेगा.. रास्ते मे विवेक का दोस्त पंकज मिला था जो की उसके दादाजी को अस्पताल ले जा रहा था.. सुना मैने सब्जी खरीदते वक़्त विवेक को.. जो पंकज के दादाजी को कह…

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हर बार पुरुष ही गलत नही होता..

मैने गाड़ी पार्क करी और डोर बेल बजाने लगा… बहुत देर तक कोशिश करी पर गेट नहीं खुला.. फिर मैंने अपने पापा को कॉल किया तो उन्होने फोन भी नही उठाया… मैंने फिर घड़ी देखी तो पौने बारह बजे थे.. सोचने लगा आज पापा बड़े जल्दी सो गए.. फिर डुप्लिकेट चाबी से मैंने ताला खोला……

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बद्लाव होगा मगर कब???

मस्त मस्त चल रही थी पवन, आस-पास हरियाली थी नीला नीला था गगन, अपनी रफ्तार में मगन थे वह घोटक, क्या पता था उन्हें घुमाना होगा ऐसा घातक, एक नन्ही सी थी वो जान, मन में बहुत थे उसके भी अरमान, उसे मालूम भी नहीं होता होता क्या है सम्मान, पर यह समझ रही थी…

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‘बेटी’ समझौता या अभिमान

सही कहते हैं लोग वंश का दीपक तो बेटा होता हे, बेटी का होना तो सिर्फ एक समझौता होता हे, बेटा तो मनचाहा अक्षर पड़ जाता हे, और बेटी की पड़ाई से बोझ बढ़ जाता है, फिर भी भैया कि डिग्री देख बड़ा चहकती हैं, पड़ाई के मोह से समझौता कर दुख ना किसी को…

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