नारी ,नारी क्यों नहीं रहना चाहती..

आजकल एक बड़ी विडंबना सामने आ रही है नई पीढ़ी की युवा लड़कियों की सोच पर। हर लड़की अपने आप को साबित करे वो ठीक, पर प्रतियोगिता करे की वो पुरुष जैसी है वो कहा तक सही। हां,शायद बात अटपटी जरूर लग रही है पर हां खुद की पहचान खोकर आज की लडकिया पुरुष जैसे…

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चरित्र निर्माण या भविष्य ।।

अभी कुछ दिन पहले कुछ घटनाएं ऐसी सुनाई दी जिससे दिल दहल गया स्कूली बच्चे और युवा वर्ग अपराधिक गतिविधियों में संलग्न हो रहे है ।बम बालस्ट हो या कोई और अपराध इं सबमें कुछ बाते समान है जैसे कि इन अपराधियों में अधिकतर शिक्षित और अच्छी वित्तीय स्थिति से है।फिर क्या कारण होते है…

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अपने सपने, सपने बच्चों के..

हाल ही कुछ फिल्में बनी जो बच्चों के सपनो के आधार पृष्ठ पर थी। जिनमे एक ओर बच्चों को सपने देखने और पूरे करने की आज़ादी देना चाहिये पर ज़ोर दिया गया वही एक ओर माता पिता के सपनो को पूरा करने की जिम्मेदारी बच्चों की। शायद ये सवाल हर बच्चे और माता पिता के…

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जिम्मेदार बच्चों के बदलते व्यवहार..

आज हर माता पिता अपने बच्चों को उच्च शिक्षा प्रणलि वाले स्कूलो मे भेज रहे है।बात सही है कि आज के प्रतियोगी दौर में भेजना भी चाहिये मगर सिर्फ प्रतियोगिताये ही जीवन का मकसद है क्या? मोटी सेलेरी ,अन्धाधुन्ध भीड़ मे थकी मंदी जिंदगी जीना,समय की कनजुसियत और पैसो की अय्याशी यही ज़िन्दगी हम देना…

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अल्फ़ाज़

अल्फ़ाज़.. कभी सुनकर सिमट गए, कभी अनकहे ही रह गए कभी चाह कर भी न रुक पाए कभी जज्बो में बह गए दो राहो के मज़धर में कुछ के कुछ हो गए कभी जो कहे न गए वो भी सुने गए जो कह सके कभी वो न सुने गए ये अल्फ़ाज़ के जज़्बात है ‘पलछिन’…

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