बचपन और बुढ़ापा

उन तकिए और कम्बल में से बुढ़ापे की महक आ रही थी।और वह बूढ़ी दादी मानो हर रोज अपने बुढ़ापे को कोसा करती थी और भगवान से पूछा करती थी कि ‘यह बुढ़ापा उन पर कहर कि तरह क्यों बरसा है?’ उनकी पोती उनके पास आई,उनका सर दबाया,अपने कोमल हाथों से उनकी पीठ सहलाई और…

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सुना है शाम आई ह..

सुना है शाम आई है शमा की याद लाई है हां मैं लौट आऊंगी कसम उसने उठाई है कहा बरसात लाएगी मेरे संग भीग जाएगी न तो स्वयं ही आई न बरसात आई है परिंदे लौट आये है बढ़ रहे शाम के साये द्वार भी खोल आये हम काश इस राह से वो आये शाम…

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वो मां ही है..

वो है तो ज़िन्दगी में खुशियां ही खुशियां है, वो है तो हर जगह उम्मीदों की नई बगिया है। कभी कभी सोचता है ये मन, क्या रहा होगा उसका बचपन? उसकी खववहिशे? उसका मन ? वो भी कभी मासूम हुआ करती होगी , काम को देख कर वो भी जी चुराया करती होगी। लेकिन, लेकिन…

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