इस गुस्से ने मुझे तबाह कर दिया..

छोटी बात थी बस बड़ी बन गई,
ज्यादा नहीं पर गलती हो गलती हो गई,
कोशिस की थी मेने रोकने की,
सोचा था मेने की अपने गुस्से को क़ाबू कर लूंगा,
लेकिन आज फिर न कर सका इसे , गुस्से ने मुझसे सब छीन लिया |

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वो बचपन ही अच्छा था..

वो बचपन ही अच्छा था..
जिसमे छोटी ख़ुशी भी बड़ी बात बन जाती थी,
बचपन की हसी भी किसी किसी के लिए दिन भर की थकान की दवा बन जाती थी.
सपने देखते थे सब बचपन मे लेकिन उन सपनो को खो देने का डर नहीं होता था,
सच्च मे वो बचपन ही अच्छा था|

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बद्लाव होगा मगर कब???

मस्त मस्त चल रही थी पवन, आस-पास हरियाली थी नीला नीला था गगन, अपनी रफ्तार में मगन थे वह घोटक, क्या पता था उन्हें घुमाना होगा ऐसा घातक, एक नन्ही सी थी वो जान, मन में बहुत थे उसके भी अरमान, उसे मालूम भी नहीं होता होता क्या है सम्मान, पर यह समझ रही थी…

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अल्फ़ाज़

अल्फ़ाज़.. कभी सुनकर सिमट गए, कभी अनकहे ही रह गए कभी चाह कर भी न रुक पाए कभी जज्बो में बह गए दो राहो के मज़धर में कुछ के कुछ हो गए कभी जो कहे न गए वो भी सुने गए जो कह सके कभी वो न सुने गए ये अल्फ़ाज़ के जज़्बात है ‘पलछिन’…

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‘बेटी’ समझौता या अभिमान

सही कहते हैं लोग वंश का दीपक तो बेटा होता हे, बेटी का होना तो सिर्फ एक समझौता होता हे, बेटा तो मनचाहा अक्षर पड़ जाता हे, और बेटी की पड़ाई से बोझ बढ़ जाता है, फिर भी भैया कि डिग्री देख बड़ा चहकती हैं, पड़ाई के मोह से समझौता कर दुख ना किसी को…

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