अल्फ़ाज़

अल्फ़ाज़.. कभी सुनकर सिमट गए, कभी अनकहे ही रह गए कभी चाह कर भी न रुक पाए कभी जज्बो में बह गए दो राहो के मज़धर में कुछ के कुछ हो गए कभी जो कहे न गए वो भी सुने गए जो कह सके कभी वो न सुने गए ये अल्फ़ाज़ के जज़्बात है ‘पलछिन’…

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‘बेटी’ समझौता या अभिमान

सही कहते हैं लोग वंश का दीपक तो बेटा होता हे, बेटी का होना तो सिर्फ एक समझौता होता हे, बेटा तो मनचाहा अक्षर पड़ जाता हे, और बेटी की पड़ाई से बोझ बढ़ जाता है, फिर भी भैया कि डिग्री देख बड़ा चहकती हैं, पड़ाई के मोह से समझौता कर दुख ना किसी को…

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वो लड़की

वो लड़की कुछ चुप सी कुछ अनकही सी बातो को मन मे लेकर रहती है कुछ उम्मीदें कुछ सपने बुनकर रखती है मगर पागल हवा से डरती है कही उड़ा न ले जाए ये सपने इसलिये मन ही मन दबाकर रखती है चेहरे पर रूप तो निखरा है मगर आंधिया अंदर चलती है हसी मे…

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है जिंदगी..

किस मोड़ पर ला खड़ा किया है जिंदगी। आने वाले बेहतर कल के लिए , हमसे हमारा आज ही छिन लिया है जिंदगी। अब तुजसे एक ही सिफारिश है, अगर हार भी जाऊ , जिंदगी के इन इम्तहानों मे।। तो मुझे हारने न देना.. एक उम्मीद दिखा कर फिर खड़ा कर देना | वो संघर्ष…

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