समाज मे संस्कार..

मैं बजार से लौटी तो बड़ी घबराइ हुई थी.. मैने सोचा ना था कि मेरा बेटा विवेक इस तरह किसी बुजुर्ग से बात करेगा.. रास्ते मे विवेक का दोस्त पंकज मिला था जो की उसके दादाजी को अस्पताल ले जा रहा था.. सुना मैने सब्जी खरीदते वक़्त विवेक को.. जो पंकज के दादाजी को कह…

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हर बार पुरुष ही गलत नही होता..

मैने गाड़ी पार्क करी और डोर बेल बजाने लगा… बहुत देर तक कोशिश करी पर गेट नहीं खुला.. फिर मैंने अपने पापा को कॉल किया तो उन्होने फोन भी नही उठाया… मैंने फिर घड़ी देखी तो पौने बारह बजे थे.. सोचने लगा आज पापा बड़े जल्दी सो गए.. फिर डुप्लिकेट चाबी से मैंने ताला खोला……

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